90 मिनट की इस फ़िल्म ने बस्तर के चंदरु को हॉलीवुड का सुपरस्टार बना दिया।

टाइगर बॉय चेंदरू

छत्तीसगढ़ का असल मोगली चेंदरू (Chendru The Tiger Boy) की एक ऐसी कहानी जिसे आप असल जीवन का मोगली कह सकते है ।इस लड़के की कहानी दूर – दूर तक इतनी विख्यात हुई जिसने 1960 में बस्तर जिले के क्षेत्रों  को ना केवल देश में बल्कि विदेश में  भी सुर्खियों में लाकर रख दिया था। चेंदरू की कहानी सुनने के बाद फ्रांस, स्वीडन, ब्रिटेन और दुनिया के कोने-कोने से लोग सिर्फ उसकी एक झलक देखने और उसकी एक तस्वीर अपने कैमरे में कैद करने के लिए बस्तर पहुंचते थे। जिनमे से एक स्वीडन के निर्माता अरने सक्सडोर्फ थे, जिन्होंने एक फ़िल्म बनाई “द फ्लूट एंड द एरो” जिसे भारत  में  नाम दिया गया “द जंगल सागा”।

फ़िल्म अंतराष्ट्रीय स्तर पर खूब सफल रही। 1957 में बनी इस फ़िल्म को 1958 के कांस फ़िल्म फेस्टिवल में भी जगह मिली। इस फ़िल्म में बाघ और लड़के का किरदार निभाने वाले जंगल बॉय और कोई नहीं बल्कि बस्तर के नारायणपुर जिले का रहने वाला चेंदरू था ।

नारायणपुर घने जंगलो से घिरा है वही यहाँ आदिवासी अपना गुज़र बसर करते है ।चेंदरू के जीवन का दिलचस्प पहलू था उसकी टाइगर से दोस्ती, वह भी रियल जंगल के। दोस्ती भी ऐसी कि दोनों हमेशा साथ ही रहते थे, खाना, खेलना, सोना सब साथ-साथ।बस्तर का रियल मोगली कहलाने वाले चेंदरू ने 2013 में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

Chendru The Tiger Boy
Chendru The Tiger Boy

चेंदरू टाइगर बॉय के नाम से क्यूँ जाना गया

मुरिया जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाले  चेंदरू के जीवन में बदलाव  तब आया जब  उसने 1959 में अपने गांव से सटे अबूझमाड़ के जंगलों में एक बाघ शावक को बचाया और उस  जंगली जानवर को तब तक पाला जब तक वह पूरी तरह से विकसित नहीं हो गया।चेंदरू ने इस शावक का नाम टेप्पू रखा और इस तरह शुरू हुई एक लड़के और बाघ की दोस्ती की कहानी ।इस घटना ने चेंदरू को टायगर बॉय के नाम से प्रसिद्धि दिलाई।

Chendru The Tiger Boy: 1960 के दशक में इस सच्ची कहानी को विख्यात स्वीडिश फिल्म निर्माता अरनी सक्सडॉर्फ ने पर्दे पर फ़िल्माया।अरनी सक्सडॉर्फकी पत्नी एस्ट्रिड ने बाद में “चेंदरू: द बॉय एंड द टाइगर” नामक एक पुस्तक लिखी,जो अंततः बेस्टसेलर बन गई। इस तरह चेंदरू ना केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में  टायगर बॉय (chendru the tiger boy) के नाम से पहचाना जाने लगा ।

चेंदरू का स्वर्ण युग

chendru the tiger boy
Chendru The Tiger Boy

स्वीडन में चेंदरू करीब एक साल तक रहा, उस दौरान उसने बहुत सी प्रेस कॉन्फ्रेंस, फ़िल्म स्क्रीनिंग की, और अपने चाहने वालो से मिला। दुनिया उतावली थी उस बाल कलाकार से मिलने जिसकी दोस्ती एक बाघ से है, जो एक बाघ के साथ रहता है। पूरा विश्व अब चेंदरू को टाइगर बॉय (Chendru The Tiger Boy)के नाम से जानने लगा।टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक रिपोर्ट के अनुसार बस्तर के एक पत्रकार हेमंत पाणिग्रही ने याद किया कि चेंदरू ने एक बार एक साक्षात्कार के दौरान उनसे कहा था कि वे पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिले थे और उनसे कुछ करने का वादा किया था, लेकिन उनके पिता ने उन्हें कहीं जाने की अनुमति नहीं दी।

चेंदरू उदास रहने लगा पर वह धीरे धीरे पुरानी ज़िन्दगी में लौटा और फिर गुमनाम हो गया। गुमनामी की ज़िंदगी जीते चन्दरु की 2013 में खबर आई, पर वह खबर उसकी मौत की थी। गुमनामी में खोए हॉलीवुड के उस सितारे के लिये कोई सार्वजनिक शोकसभा तक नही देखी गई, सब भूल चुके थे उसे। अंत मे सरकार को होश आया और रायपुर में निर्मित जंगल सफारी में टेम्बू और चेंदरू की एक मूर्ति स्थापित की गई।

Chendru The Tiger Boy

चेंदरू – Tarzan of Bastar

जीवन के बाद के वर्षों में, चेंदरू को हर रोज दो वर्ग भोजन के लिए लड़ने वाले मजदूर के रूप में संघर्ष करना पड़ा। अंत में चेंदरू की मृत्यु एक अनसंग नायक के रूप में हुई, जो अपनी छोटी-सी रील की प्रसिद्धि और वास्तविक जीवन की कठिन दस्तक की यादों के बीच डूबा हुआ था।बस्तर के जंगल से हॉलीवुड का स्टार और फिर गुमनामी, कहानी फिल्मी है पर सच है। जीवन में उतार चढ़ाव ही जीवन का सत्य है, और चेंदरू की कहानी उसका सीधा उदारहण है।

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90 मिनट की इस फ़िल्म ने बस्तर के चंदरु को हॉलीवुड का सुपरस्टार बना दिया।

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