क्या जूनागढ़ की रियासत पाकिस्तान को लेकर आजादी वाले दिन तक असमंजस में थी ?

कहाँ है जूनागढ़(junagadh) जिसकी प्रजा ने एक होकर भारत से मिलने का एक ऐतिहासिक फ़ैसला किया?

जिन राज्यों ने 15 अगस्त तक विलय पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे उनमें से एक राज्य जूनागढ़ था । यहाँ का  नबाव एक मुसलमान था, उसका नाम महावत खान था जबकि अधिकांश प्रजा हिन्दू थीं । जूनागढ़ भारत के पश्चिम राज्य गुजरात के काठियावाड़ इलाक़े में स्थित था,यह हरा भरा इलाक़ा अरब सागर से जुड़ा हुआ था । जूनागढ़ तीन दिशाओं से हिन्दुस्तान की सरहदों से घिरा हुआ था,इसकी चौथी दिशा में लंबा समुंद्री तट था,जोकि इसकी विशेषता थी ।इसका मुख्य बंदरगाह वेरावल,पाकिस्तान के मुख्य बंदरगाह शहर और उसकी तत्कालीन राजधानी कराची से महज 325 नॉटिकल  मील की दूरी पर था ।

आजादी के बाद जूनागढ़ की प्रजा आख़िर भारत को पाकिस्तान को लेकर असमंजस में क्यूँ थी ?

जूनागढ़( (principality ofJunagadh)

क्या चाहती थी जूनागढ़ की रियासत (principality ofJunagadh)

 15 अगस्त 1947 का दिन भारत के ऐतिहासिक दिनों में से एक था । एक और यहाँ पूरा भारतवर्ष आज़ादी के  जश्न में डूबा हुआ था,वहीं दूसरी और एक  रियासत  ऐसी भी थी, जहां की प्रजा  अपनी आजादी को लेकर असमंजस में थीं।वह राज्य जूनागढ़ था ।  

जूनागढ़ रियासत (Principality) में हिन्दुओं के पवित्र स्थल 

इसी रियासत (Principality) में गिरनार भी था जहाँ एक पहाड़ी की चोटी पर संगमरमर का बना हुआ जैनियों का भव्य मंदिर था। हिन्दुओं का पवित्र स्थल सोमनाथ भी जूनागढ़ की सीमा के अंदर था।

जूनागढ़ के नवाब के शोंक, जो प्रजा की सालाना आमदनी का एक हज़ार गुना थी ।

Junagadh ke nawab
जूनागढ़ के नवाब

 1947  में जूनागढ़ का नवाब महावत खान था।मोहब्बतखांजी को कुत्ते पालने का भरपूर शौक था। कई प्रजातियों के कुत्ते उनके आलीशान महल में आरामदायक जिंदगी व्यतीत किया करते थे। जानकारों की मानें तो उनके पास लगभग 100 कुत्ते-कुतिया थे। इतना ही नहीं, इनके लिए अलग-अलग कमरों की व्यवस्था के अलावा सबके लिए एक-एक नौकर भी लगाया गया था।इनके शौक़ जनता पर भारी थे क्यूँकि कुत्ते पर जो ख़र्च किए जाते थे वह उस समय की उसकी प्रजा की सालाना आमदनी का एक हज़ार गुना होता था।

जूनागढ़ के दीवान का नवाब पर प्रभाव 

 जब जूनागढ़ (Junagadh)का नबाव 1947 में यूरोप में गर्मियों की छुट्टी माना रहा थे ।उसी समय उसके तत्कालीन दीवान को हटाकर सर शाहनवाज़ भुट्टो को जूनागढ़ रियासत (Principality) का दीवान बना दिया गया,जो सिंध के कदावर मुस्लिम लीग नेता और जिन्ना के बेहद करीबी था।जब नवाब यूरोप से वापस आया तो उसके दीवान ने उसे भारतीय संघ में न मिलने के लिए दबाव डाला।

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जूनागढ़ का पाकिस्तान में विलय 

14 अगस्त को जब सत्ता हस्तांतरण का दिन आया तो नबाव ने घोषणा की कि वह पाकिस्तान में मिल जायेगा । हलाकीं कानूनी तौर पर उसे  ऐसा करने का आधिकार था ,क्योकिं Lapse Of Paramountcy के तह यह प्रावधान था,कि रजवाड़े जिसके भी साथ चाहे बने रह सकते है या अपने को स्वतंत्र  घोषित कर सकते है ।लेकिन भौगोलिक रूप से यह सही नहीं था।

 रियासत  (Principality) की असी फीसदी प्रजा हिन्दू थी ।जो जिन्ना के  ‘दो -राष्ट्र के सिद्धांत ‘ के खिलाफं था ।13 सितम्बर को जूनागढ़ का पाकिस्तान में विलय हो गया ।इससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान जूनागढ़ का इस्तेमाल करके जम्मू कश्मीर को हथियाना चाहता था।क्यूँकि कश्मीर भी 15 अगस्त तक किसी देश में भी शामिल नहीं  हुआ था । वहां का महाराज हिन्दू था,जबकि उसकी प्रजा मुसलमान थी।

पाकिस्तान द्वारा जूनागढ़ के विलय को स्वीकार कर लिए जाने से भारतीय नेता काफी नाराज हुए। जूनागढ़ के मसले में सरकार सीधे तौर पर हताक्षेप नहीं कर सकती थी क्योकिं Lapse Of Paramountcy का  प्रावधान आड़े आ जाता।ऐसे हालत में भारत के गृह मंत्री सीधा हस्तक्षेप करते तो कानूनी अरचन आ सकती थी।

जब  वी.पी मेनन नबाव से समझौता करने जूनागढ़ रियासत (Principality) गए । तब नवाब ने बीमारी का बहाना बनाकर मिलने से इंकार कर दिया ।नबाव के दीवान से मेनन को मुलाकात करनी पड़ी । मेनन ने शाहनवाज़ भुट्टो से कहा भौगोलिक और सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टि से जूनागढ़ रियासत (Principality) को हिन्दुस्तान में शामिल हो जाना चाहिए।

अर्जी हुकूमत (Arzi Hukumat)  का गठन 

जूनागढ़ के संग्राम में शुरू से ही आगे रहे वंदे अख़बार के संपादक सामलदास गाँधी ने कहा की लोग अपने हाथ में कानून को लेकर सरकार बनाये को राजी  हो गए है।सरदार पटेल जूनागढ़(Junagadh) की प्रजा के द्वारा सरकार बनाये की बात को लेकर ख़ुश नहीं थे, उनका माना था कि इसे आने वाले समय में और परेशानियाँ  खड़ी हो सकती है |

इसके बाद अर्जी हुकूमत  को बनाया गया,सरदार पटेल मानते थे,कि जूनागढ़ रियासत (Principality) की प्रजा को ये जंग ख़ुद लड़नी चाहिए, यानि जूनागढ़  की प्रजा और उनके प्रतिनिधि आवाज़ उठाये गए तो ही जूनागढ़ भारत में रह पायेगा। 

वी.पी मेनन ने मुंबई में  काठियावाड़ी प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की,इस बैठक में सारे प्रतिनिधि इस बात पर सहमत थे,कि लोगों के द्वारा एक संग्राम होना चाहिए  और इसी संग्राम के चलते जूनागढ़ रियासत (Principality)में समान्तर सरकार के तौर पर अर्जी हुकूमत के विचार को स्थापित किया गया था । 23 सितम्बर 1947 को अर्जी हुकूमत को बनाने का फ़ैसला लिया गया था, लेकिन इसका ऐलान करना अभी बाकि था।

24 सितम्बर 1947 को अपनी संध्या प्रार्थना में  गांधीजी ने कहा कि जूनागढ़ तो पाकिस्तान में चला  गया, पर जूनागढ़ (Junagadh)पाकिस्तान में कैसे जा सकता है,यह मुझे समझ में नहीं आता। आस पास की सारी रियासते हिन्दू है और उसकी आबादी का बड़ा हिसा हिन्दुओं का है, तो भी जूनागढ़ पाकिस्तान का हिसा बना। यह हैरान  करने वाली बात है,लेकिन ऐसी घटनाएँ तो हिन्दुस्थान में हर जगह घट रही है। पाकिस्तान को जूनागढ़  छोड़ देना चाहिए।अर्जी हुकूमत बनाने  वाले नेतों के लिए गांधीजी के ये वाक्य आशीर्वाद के सामान थे।

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अर्जी हुकूमत का घोषणा पत्र

समालदास गांधी अर्जी हुकुमत के प्रधान बने। 25 सितम्बर 1947 को अर्जी  हुकूमत की औपचारिक स्थापना हुई और एक प्रतिनिधि मंडल भी बनाया गया।एक घोषणा पत्र का भी अनावरण किया गया, इस घोषणा पत्र में कहा गया था,कि जूनागढ़(Junagadh) के नवाब ने हिन्दू बहुमत वाली प्रजा की भारत से जुड़ने की इच्छा को नज़रंदाज़ करते हुए पाकिस्तान में मिलने की भूल की है।साथ ही ऐसी मुश्किल परिस्थितियां पैदा की है जिससे प्रजा को यह फ़ैसला काबुल करना पड़ा । ऐसा करके नवाब ने प्रजा की वफ़ादारी को खो दिया।

पाकिस्तान ने भी आत्मनिर्णय के सिद्धांत को भी  तोड़ा था और इस तरह जूनागढ़ रियासत (Principality) को पाकिस्तान में मिलाना अयोग्य था और ग़ैरकानूनी भी था। इसमें यह भी लिखा गया था कि जूनागढ़ (Junagadh)नवाब के पास जो सत्ता और अधिकार थे, वो अब अर्जी हुकूमत की  सरकार को दे दिया गये है। स्वतंत्र भारत के संविधान में दिए गए प्रजा  के संप्रभु सिद्धांत को इसमें शामिल किया गया था।

रामचंद गुहा की किताब ‘ भारत गाँधी के बाद’ में कहा गया है,कि यह सरकार जूनागढ़(Junagadh) में चल रहे लोकप्रिय आंदोलन का मुख्य केंद्रबिंदु बन गई |इन घटनाओं से घबराकर नवाब अपने कुछ प्रिय कुतों  को लेकर कराची भाग गया |अब रियासत का सारा जिम्मा  दीवान के कंधों पर आ गया ।27 अक्टूबर को शाहनवाज़ भुट्टो ने जिन्ना को लिखा, कि ऐसा लगता है कि काठियावाड़ के मुसलमान में पाकिस्तान के प्रति सारा उत्साह काफूर हो गया है।

जूनागढ़ में जनमत संग्रह .

इसके कुछ दिनों के बाद शाहनवाज़ ने भारत सरकार को सूचित किया कि वे जूनागढ़ का प्रशासना भारत सकार के सपुद  कर देने को तैयार  हैं |औपचारिक    रूप से प्रशासन  का हस्तांतरण 9 नवम्बर को ही हो पाया ।कुछ mountbatten को संतुष्ट करने के लिए और कुछ इसकी वैधानिकता को स्थापित करने के लिए भारतीय सरकार ने फिर से एक  जनमत संग्रह  का आयोजन करवाया ।20 फ़रवरी 1948 को हुए जनमत में जूनागढ़(Junagadh) के 91 फीसदी लोगों ने हिन्दुस्तान में शामिल होने का फैसला कर लिया ।

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