Jhitku Mitki Ki Premkatha | झिटकु मिटकी की प्रेमकथा: जिसकी छत्तीसगढ़ के आदिवासी पूजा करते है ?

Sadiyo purani Jhitku Mitki ki ye amar premgatha desh me hi nahi videshon me bhi apni alag pehcahan banaye huye hai.

Jhitku Mitki

Jhitku Mitki Ki Premkatha | झिटकु मिटकी की प्रेमकथा: जिसकी छत्तीसगढ़ के आदिवासी पूजा करते है ?

चलों अपनी चाहते नीलाम करते है , मोहब्बत का सौदा सरे आम करते है ।

तुम अपना साथ हमारे नाम कर दो, हम अपनी ज़िंदगी तुम्हारे नाम करते है ।

झिटकू-मिटकी (Jhitku Mitki) की प्रेमगाथा भी इस शायरी से इत्तेफाक रखती है ।बस्तर के घने जंगलो में ये आदिवासियों का ये प्रेमी जोड़ा तब पूजा जाने लगा , जब ह्रदय यानी मिटकी के भाइयों ने अपनी कुल देवी के सपने में आने और और तंत्रिको के द्वारा नरबलि माँगे जाने के कारण, उसके पति की बलि बिना मिटकी को बताए दे दी। जिससे गाँव में बनाए गए तालाब में पानी रोका जा सके।जिसके बाद मिटकी ( Mitki ) ने अपने प्रेमी यानी झिटकू (jhitku)के लिए उसी पानी से भरे तालाब में कूदकर अपनी जान दे दी ।लोक कथाओं में अगर प्रेमी-प्रेमिकाओं का उल्लेख न हो तो वह कथा या कहानी नीरस मानी जाती है।

छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में जहां लोरिक-चंदा की कथा प्रचलित है, उसी तरह बस्तर अंचल में झिटकू-मिटकी की प्रेम कथा वर्षों से ग्रामीण परवेश में रची- बसी है। पीढ़ी दर पीढ़ी इनकी कथा बस्तर की वादियों में गूंज रही है। झिटकू-मिटकी (Jhitku Mitki) वो प्रेमी युगल है, जिनकी प्रेम कहानी सत्य घटना पर आधारित बस्तर के लोक कथा में शामिल है ।इतना ही नहीं इन जोड़ो की बनी आकृति ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में इसकी काफ़ी माँग है ।

क्या थी झिटकू-मिटकी की अमर प्रेम कहानी ?

Jhitku Mitki Ki Premkatha
झिटकू-मिटकी(jhitku-mitki)

झिटकू-मिटकी(Jhitku Mitki) की यह पुरानी अमर प्रेमगाथा बस्तर जिले के विकासखंड विश्रामपुरी के पेंड्रावन गांव की है। इसके अनुसार गोंड आदिवासी का एक किसान पेंड्रावन में निवास करता था। उसके सात बेटे और ह्रदया नाम की एक बेटी थी जो बाद में मिटकी के नाम से जानी गई। सात भाइयों में अकेली बहन होने के कारण वह भाइयों की बहुत प्यारी और दुलारी थी।

इनकी प्रेम कहानी भी कई पत्र पत्रिकाओं में अलग अलग बताई गई है हालाँकि lallantop के एक इंटर्व्यू में फरसगाँव के स्थानी निवासी ने इन दोनों की कथा को एक क्रम से बताने का प्रयास किया है जिसमें वो बताते है बस्तर के द्वार केसकाल की घाटी से विश्रामपूरी रोड पर पेंड्रावन गाँव में मिटकी का परिवार रहा करता था। बस्तर में कई परम्परायें है जिसके तहत एक आदमी के दो नाम हुआ करते है, और इसी के तहत ह्रदय का दूसरा नाम मिटकी दिया गया था ।

बस्तर के आदिवासियों में एक और पुरानी परंपरा है जिसे पैसा मुंडी या उढारिया कहा जाता है। इस परंपरा के तहत यदि किसी लड़की के पिता आर्थिक रूप से सक्षम ना हो शादी करने के लिए तो लड़की लड़के के घर चली जाती थी। वही लड़के के पिता कर शादी करने में सक्षम ना हो तो लड़के को लड़की के घर यानी ससुराल में एक साल तक काम करना होता था उसके बाद लड़की की विदाई की जाती थी ।

चुकी मिटकू की परिवार की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी और झिटकू-मिटकी के बीच प्यार था दोनो एक ही जाति से थे इसलिए मिटकू घर जमाई बन गया था और अपने कुत्ते के साथ लड़की के घर में आकर रहने लगा।झिटकू गाँव में मवेशी चराने का काम करने लगा और दोनों के दिन हंसी-खुशी बीतने लगे ।

कुछ साल बाद गांव में अकाल पड़ा, नौबत यह थी कि गांववाले रोजी-रोटी के लिए तरसने लगे और इस समस्या से निपटने के लिए ग्रामीणों ने खेती की सिंचाई के लिए श्रमदान कर तालाब तैयार किया । लेकिन बरसात में तालाब में पानी ठेहरा ही नहीं और बारिश खत्म होते ही तालाब सूख गया ।

तालाब में पानी कैसे ठहरे इसके लिए गांववालों ने आपस में मिलकर बैठक की, मीटिंग में शामिल तांत्रिकों ने यह ऐलान कर दिया कि जब तक तालाब में किसी व्यक्ति की बलि नहीं देंगे तब तक उसमें पानी नहीं भरेगा. बलि की बात सुन ग्रामीण पीछे हट गए, लेकिन उस गांव में कुछ ऐसे भी युवक थे जो सुकलदाई को पाने की लालसा रखते थे ।

ऐसे युवकों ने सुकलदाई के सात भाइयों को भड़काना शुरू किया कि –

झिटकू तो दूसरे गांव का है, रही बात मिटकी की तो उसकी उम्र ही क्या है कोई भी युवक उसे शादी कर लेगा ।

अगर सातों भाई मिलकर सुकल की बलि तालाब में देते है तो गांव में मान उनका मान बढ़ जाएगा । “

मिटकी के भाई भी युवकों की बातों में आ गए ।

इसी दौरान इन सभी ने तालाब बनाने के लिए खुदाई शुरू की ।दिन में वे लोग खुदाई करते और शाम को घर चले जाते थे, लेकिन कड़ी मेहनत के बाद भी तालाब में पानी का एक क़तरा भी नज़र नहीं आता और उनका प्रयास व्यर्थ हो जाता था।

इस तरह अंधविश्वास के आधार पर उन्होंने इस बात के लिए हामी भर ली और बलि के लिए झिटकू का चयन कर लिया। एक रात उन्होंने उसी तालाब के मेड़ में झिटकू की हत्या कर दफ़न कर दी।जब वो सभी घर आए तो बहन ने झिटकू के बारे में पूछा पर सभी भाइयों ने कुछ ना कुछ बहाना कर दिया किसी भाई ने ये भी कह दिया की वो गाँव छोड़ कर चला गया।

कथा के अनुसार झिटकू का कुत्ता हमेशा उसके साथ रहता था ।मिटकी के परेशान होते देख वो भौकने लगा और मिटकी की साड़ी को अपने मुँह से पकड़ कर उसे उस तालाब में ले गया, जहाँ उसे दफ़नाया गया था।कुत्ते ने मिट्टी को खोद खोद कर मिटकी को बताने का प्रयास करने लगा । इस लोक कथा में ये माना गया है की उस बलि के बाद तालाब पानी से लबालब भर चुका था ।जब मालूम हुआ तो उसने भी झिटकू के वियोग में तालाब के पानी में कूदकर अपने जीवन को समाप्त कर लिया। इस बलिदान की कहानी जंगल में आग की तरह सभी गांवों में फैल गई।

बहन की लाश तैरते देख भाइयों का सब्र टूट पड़ा और उन्होंने ग्रामीणों के सामने अपनी भूल स्वीकार कर ली और इस घटना के बाद से गांव में झिटकू और हृदय को झिटकु-मिटकी के नाम से जाना जाने लगा । मिटकी के सती होने के बाद से इस देव युगल झिटकू-मिटकी (Jhitku Mitki) की पूजा की जाती है ताकि किसी की प्रेम कहानी अधूरी न रहे। इस देव युगल के अनेक नाम हैं : इन्हें डोकरा – डोकरी , डोकरी देव, गप्पा घसिन , दुरपत्ती माई, पेंड्रावडीन माई, गौडिन देवी और बूढ़ी माई भी कहा जाता हैं । इनकी मूर्ति में देवी माता को सिर पर मुकुट धारण किए , कान में खिलंवा पहने, बायें हाथ में सब्बल और टोकरी लिए बनाया जाता हैं ।

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बस्तर के इस क्षेत्र में झिटकू-मिटकी की मान्यता की अपनी परंपरा है। जिसकी गूंज पूरे देश में है। इनके वंशज आज भी पेंड्रावन गांव में रहते हैं तथा इन देव युगल पर चढ़ाया गया समस्त धन उन्हें समर्पित किया जाता है। यदि कोई अन्य उस धन का उपयोग करे तो देव उसे सताते है।

आज भी बस्तर के गांवों में लोग अपने मवेशियों के तबेले में खोडिया देव की पूजा करते हैं। इसके साथ ही खुद की जान देने वाली गपादाई मिटकी को ग्रामीण आराध्य देवी के नाम से पूजते हैं। और विश्रामपुरी के उसी गांव में वर्तमान समय में भी झिटकु मिटकी के नाम से मंडई मेला का आयोजन किया जाता है । झिटकू-मिटकी की ये मूर्ति राष्ट्रपति भवन की भी शोभा बढ़ा रही है।

आदिवासी झिटकू-मिटकी(Jhitku Mitki) को क्यूँ पूजते हैं।

बस्तर का आदिवासी समाज झिटकू-मिटकी(Jhitku Mitki) को धन का देवी-देवता मानते हैं। चुकी मिटकी मरने के बाद शक्तिशाली बन गई थी और बलि देने के बाद तालाब में पानी भर जाने के कारण गाँव में सूखे से निजात मिल पाया था और समृद्धि आई थी । इसलिए झिटकू-मिटकी (Jhitku Mitki) को धन के देवी देवता माना गया । विभिन्न मेला-मंडई में झिटकू-मिटकी (Jhitku Mitki) की पीतल और लकड़ी से बनी प्रतिमाएं बेचने के लिए लाई जाती हैं। ग्रामीण अपने परिवार की संपन्न्ता के लिए इन्हें देवगुड़ी में अर्पित करते हैं।

इधर बस्तर आने वाले हजारों सैलानी भी इन प्रेमियों की काष्ठ और धातु की मूर्तियां बड़ी आस्था के साथ अपने साथ ले जाते हैं। झिटकू-मिटकी(Jhitku Mitki) की मूर्तियाँ अमेरिका, जापान, स्काटलैंड, सिंगापुर, हांगकांग, थाईलैंड के राष्ट्रीय संग्रहलायों, कला दूतावास समेत विशेष कई बड़े स्थानों की शोभा बढ़ा रही है।  

Jhitku Mitki Ki Premkatha | झिटकु मिटकी की प्रेमकथा: जिसकी छत्तीसगढ़ के आदिवासी पूजा करते है ?पाँच साल पहले क्यों लिया था इस परिवार ने ऐसा फ़ैसला

बस्तर के घड़वा शिल्पकार इस अमर प्रेम कहानी के पात्रों को मूर्तियों में गढ़ते आ रहे है

राजेंद्र बघेल कोंडागांव, छत्तीसगढ़ के एक ढोकरा शिल्पकार हैं। उन्होंने भारत और विदेशों यूएसए, रूस, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड जैसे स्थानों में आयोजित प्रदर्शनियों में भाग लिया है। राजेंद्र जी ने शिल्प में 200 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया है, जिसके लिए उन्होंने 1996 में राष्ट्रीय पुरस्कार और 2003 में कला निधि पुरस्कार जीता।ढोकरा नॉन-फेरस मेटल कास्टिंग है। जो खोया-मोम कास्टिंग तकनीक का उपयोग करता है। इस तरह की धातु की ढलाई का उपयोग भारत में 4,000 वर्षों से किया जा रहा है और अभी भी इसका उपयोग किया जाता है। मोम की कलाकृतियों एक मोहनजो-दारो के समय काल में देखा जा सकता है जिसमें नृत्य करने वाली लड़की को इतिहास के पन्नों में दिखाया गया है ।

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